कभी किताबों में फूल रखना

कभी किताबों में फूल रखना
कभी दरख़्तों पे नाम लिखना
हमें भी है याद आज तक वो
नज़र से हर्फ़-ए-सलाम लिखना

[daraKht=tree; harf=letter (as in alphabet)]

वो चाँद चेहरे वो बहकी बातें
सुलगते दिन थे महकती रातें
वो छोटे-छोटे से काग़ज़ों पर
मुहब्बतों के पयाम लिखना

[payaam=message]


गुलाब चेहरों से दिल लगाना
वो चुपके चुपके नज़र मिलाना
वो आरज़ूओं के ख़्वाब बुनना
वो क़िस्सा-ए-नातमाम लिखना

[qissaa=tale/story; naatamaam=unfinished]

मेरे नगर की हसीं फ़ज़ाओ
कहीं जो उन के निशान पाओ
तो पूछना ये कहाँ बसे हो
कहाँ हैं उन का क़याम लिखना

गई रुतों में "दीवाने" हमारा
बस एक ही तो ये मशग़ला था
किसी के चेहरे को सुबह कहना
किसी की ज़ुल्फ़ों को शाम लिखना


[mashaGalaa=preoccupation]

मैं तेरा शहर छोड़ जाऊँगा

इस से पहले कि तेरी चश्म-ए-करम माज़रत की निगाह बन जाये
प्यार ढल जाये मेरे अश्कों में आरज़ू एक आह बन जाये
मुझ पे आ जाये इश्क़ का इल्ज़ाम और तू बेगुनाह बन जाये
मैं तेरा शहर छोड़ जाऊँगा

इस से पहले कि सादगी तेरी लब-ए-ख़ामोश को गिला कह दे
तेरी मजबूरियाँ न देख सके और दिल तुझको बेवफ़ा कह दे
जाने मैं बेख़ुदी में क्या पूछूँ, जाने तू बेरुख़ी से क्या कह दे
मैं तेरा शहर छोड़ जाऊँगा

इस से पहले कि तेरे होठों से ग़ैर होठों के जाम टकराये
इस से पहले के ज़ुल्फ़ के बादल अजनबी बाज़ुयों पे लहराये
और तेरी बेबसी के नज़ारे मेरी आँखों पे आग बरसाये
मैं तेरा शहर छोड़ जाऊँगा

छोड़ कर साहिल-ए-हयात चला अब सफ़ीना मेरा कहीं ठहरे
ज़हर पीना मेरा मुक़द्दर है और तेरे होंठ दिल-नशीं ठहरे
किस तरह तेरे आस्ताँ पे रुकूँ जब न पाँव तले ज़मीं ठहरे
मैं तेरा शहर छोड़ जाऊँगा

मुझ को इतना ज़रूर कहना है वक़्त-ए-रुख़्सत सलाम से पहले
तोड़ लूँ रिश्ता-ए-नज़र मैं भी तू उतर आये बाम से पहले
ये मेरी जान मेरा वादा है कल किसी वक़्त शाम से पहले
मैं तेरा शहर छोड़ जाऊँगा

शायर: सफ़ुद्दिन सैफ़

युँही बेसबब न फ़िरा करो

युँही बेसबब न फ़िरा करो, कोई शाम घर भी रहा करो
वो गज़ल की ऐसी किताब है उसे चुपके चुपके पढ़ा करो

ये ॰खिजां की जर्द-सी शाल में जो उदास पेड़ के पास है
ये तुम्हारे घर की बहार है, इसे आंसुओं से हरा करो

कोई हाथ भी ना मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नये मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो

कभी हुस्न पर्द:नशीं भी हो जरा आशिकाना लिबास में
जो मैं बन संवर के कहीं चलूँ मेरे साथ तुम भी चला करो

नहीं बेहिज़ाब॰ वो चाँद-सा कि नज़र का कोई असर ना हो
उसे इतनी गर्मि-ए-शौक से बड़ी देर तक न तका करो

॰ खिजाँ= पतझड़
॰ बेहिज़ाब= बेपर्दा
॰ गर्मि-ए-शौक = उत्सुकता , लगन

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बशीर बद्र साहब ( १५-२-१९३५)

इल्ज़ाम जमाने के हम तो हँस के सहेंगे

इल्ज़ाम जमाने के हम तो हँस के सहेंगे
खामोश रहे हैं ये लब खामोश रहेंगे

तुमने शुरू किया तमाम तुम ही करोगे
हम दिल का मामला ना सरेआम करेंगे

हम बदमिज़ाज ही सही दिल के बुरे नहीं
दिल के बुरे हैं जो हमें बदनाम करेंगे

बदनाम करके हमको बड़ा काम करोगे
शायद जहां में ऊँचा अपना नाम करोगे

हर दाम पे ’ आकत!ब ' उन्हें तो नाम चाहिए
अच्छे से ना मिला तो बुरा काम करेंगे

कहने को बहुत कुछ है, अपनी कहानी में

कहने को बहुत कुछ है, अपनी कहानी में,
लफ्ज़ों में बयां कर दे, ऐसी नज़्म नहीं होती !

आँखो को इंतज़ार की आदत सी हो गई है,
दहलीज़ पर कोई दस्तक, बज़्म नहीं होती !

जमाना कहता है, हर रात की सुबह होती है,
ये बेकस रात, मगर अब, खत्म नहीं होती !

महबूब की मेंहदी फीकी पड़ सकती है,
बचपन की शरारत, कम नहीं होती !

पत्थर हो चुकी संवेदना हमारी,
ये आँखें अब नम नहीं होती ! !