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आ सजन ,आज बातें कर ले ....

तेरे दिल के बागों में
हरी चाह की पट्टी जैसी
जो बात जब भी उगी ,
तुने वही बात तोड़ ली

हर इक नाजुक बात छिपा ली ,
हर इक पत्ती सूखने डाल दी
मिटटी के इस चूल्हे में से
हम कोई चिंगारी ढूंढ़ लेंगे
एक दो फूंक मार लेंगे
बुझती लकड़ी फ़िर से बाल लेंगे

मिटटी के इस चूल्हे में
इश्क की एक एक आँच बोल उठेगी
मेरे जिस्म की हंडिया में
दिल का पानी खौल उठेगा

सजन .आज खोल पोटली ....

हरी चाय की पत्ती की तरह
वही तोड़ गंवाई बातें
वहीँ संभाल सुखायी बातें
इस पानी में डाल कर देख ,
इसका रंग बदल कर देख

गर्म घूंट इक तुम भी पीना ,
गर्म घूंट इक मैं भी पी लूँ
उम्र का ग्रीष्म हमने बीता दिया ,
उम्र का शिशिर नही बीतता

सजन ,आज बातें कर लें .....
.. ,

नीरज गोपाल दास

जन्म: ८ फरवरी १९२६ को पुरावली, इटावा उत्तर प्रदेश में।

शिक्षा: एम. ए. तक सभी परीक्षाओं में ससम्मान उत्तीर्ण। कालेज में अध्यापन, मंच पर कविता वाचन में लोकप्रियता और फ़िल्मों में गीत लेखन।

नीरज जी से हिन्दी संसार अच्छी तरह परिचित है किन्तु फिर भी उनका काव्यात्मक व्यक्तित्व आज सबसे अधिक विवादास्पद है। जन समाज की दृष्टि में वह मानव प्रेम के अन्यतम गायक हैं। 'भदन्त आनन्द कौसल्यामन' के शब्दों में उनमें हिन्दी का ''अश्वघोष'' बनने की क्षमता है। दिनकर जी के कथनानुसार वह हिन्दी की वीणा है' अन्य भाषा भाषियों के विचार से वह 'सन्त कवि है' और कुछ आलोचकों के मत से वह 'निराश मृत्युवादी है'।

वर्तमान समय में वह सर्वाधिक लोकप्रिय और लाडले कवि है इन्होंने अपनी मर्मस्पर्शी काव्यानुभूति तथा सहज सरल भाषा द्वारा हिन्दी कविता को एक नया मोड़ दिया है और बच्चन जी के बाद कवियों की नई पीढ़ी को सर्वाधिक प्रभावित किया। आज अनेक गीतकारों के कंठ में उन्हीं की अनुगूँज है।

प्रमुख रचनाएँ
कविता संग्रह हैं 'दर्द दिया', 'प्राण गीत', 'आसावरी', 'बादर बरस गयो', 'दो गीत', 'नदी किनारे', 'नीरज की गीतिकाएँ', संघर्ष, विभावरी, नीरज की पाती, लहर पुकारे, मुक्तक, गीत भी अगीत भी इत्यादि।

पत्र संकलन : लिख लिख भेजूँ पाती
आलोचना : पंत कला काव्य और दर्शन।