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तेरी मुनिया...

सीवन टूटी जब कपड़ों कि,
या उधरी जब तुरपाई
कभी तवे पर हाथ जला,
तब अम्मी तेरी याद आई |

छोटी-छोटी लोई से मैं,
सूरज चाँद बनाती थी

ली-कटी उस रोटी को तू,
बड़े चाव से खाती थी |

अम्मा तेरी मुनिया के भी,
पकने लगे रेशमी बाल
बड़े प्यार से तेल रमाकर
तुने कि थी साज-संभाल |

तुने तो माँ बीस बरस के
बाद मुझे भेजा ससुराल
नन्ही बच्ची देस पराया,
किसे सुनायुं दिल का हाल |

तेरी ममता कि गर्मी,
अब भी हर रात रुलाती है
बेटी कि जब हुक उठे तो
यद् तुम्हारी आती है |

जन्म मेरा फिर तेरी कोख से,
तुझसा ही जीवन पायुं.
बेटी ही हर बार मेरी,
फिर खुद को उसमे दुह्रायुं  ||

मेरी प्यारी माँ...

ये लो शीशा...


जब भी मैं रोया करता
माँ कहती
ये लो शीशा
देखो इसमें
कैसी लगती है
अपनी रोनी सूरत
अनदेखे ही शीशा
मैं सोच-सोचकर
अपनी रोनी सूरत
हँसने लगता ||

एक बार रोई थी माँ भी
नानी के मरने पर
फिर मरते दम  तक
 माँ को मैंने
खुलकर हँसते
कभी न देखा |

माँ के जीवन में शायद
शीशा देने वाला
अब कोई नहीं था||

सबके जीवन में ऐसे ही
खो जाता होगा
कोई शीशा देने वाला||


याद मुझे तू आती है माँ

 बारिश की रिमझिम बूंदों में, 
ख्वाब में और मेरी नींदों में,
 हर पल तू मुस्काती है माँ,
 याद मुझे तू आती है माँ। 
जब-जब धूप का पहरा छाया,
 तूने अपना आँचल फैलाया,
 भीड़ हो या हो तन्‍हायी, 
साथ है तेरा एहसास दिलाया।

 अपने ममता के आँचल में,
 हर मुझे सुलाती है माँ,
 याद मुझे तू आती है माँ। 

मेरे नन्हे कदमों की आहट,
 तेरे ममतामयी दिल की राहत,
 सब दिन बीते कई मौसम आये, 
कम न हुई कभी तेरी चाहत,
 तन्हायी में तेरी ये बातें, 
आकर मुझे रुलाती है माँ,
 याद मुझे तू आती है माँ। 

आज भी मेरे खेल खिलौने,
 माँ तेरी झलक दिखाते हैं,
 तेरे साथ में गुजरे पल मेरी माँ, 
अब भूले नहीं भुलाते हैं, 
अपनी बांहों के घेरे में,
 जैसे मुझे झुलाती है माँ,
 याद मुझे तू आती है माँ।

 छोङ गई अपने पीछे तू
, अपनी अनमिट सी परछाईं,
 समझ नहीं पाएगी दुनिया,
 इस रिष्ते की निष्छल गहराई
 मेरे मन की छोटी सी बगिया,
 खुशियों से महकाती है माँ, 
याद मुझे तू आती है माँ।

तुम से सब...


जब भी तुम बिस्तर से उठकर
महावर लगे पैरों से चलकर
मेहँदी लगे हाथों से दरवाजा खोलती हो,
मेरे शहर में
उषा मुस्कुराने लगती है...





जब भी तुम आँचल संवारती हो
और तुम्हारी चूरियाँ
खनक उठती हैं
मेरे शहर के मंदिर में कोई भक्त
मधुर घंटियाँ बजाता  है...

जब भी बादल छाने  लगते हैं
और मेरी याद सताने लगती है
तुम्हारी आँखे भीगने लगती हैं.
तब मेरे शहर कि
नदियों के पुलों पर
पानी छलकने लगता है...

शब्द...

शब्द,
श्रमा के भाव-भरे
अंत तक,
प्यार दिला जाते हैं |

शब्द
कोमल स्नेह भरे,
दिलों में,
प्रीत बढा जाते हैं |

शब्द,
क्रोध-भरे,
कितने विषैले,
नाग से डस जाते हैं |

शब्द,
तीखे बाण से,
चुभ जाता है तीखापन,
स्नेह सरोवर,
सुखा जाते हैं |

शब्द,
कितने फौलादी,
साहस,आत्मविश्वास-भरे,
क्रान्ति कर जाते हैं |

शब्द,
कितने कोमल,
कितने मीठे,
कितने विषैले,
कितने तीखे,
कितने फौलादी.....

रेत की सहेली...जिंदगी

हाथों से फिसलती रेत से
पूछा मैंने इक बार-
'कौन है तेरी सहेली?'

मुस्कुराकर रेत ने कहा,
'वही जो  संग तुम्हारे गाती है
उलझा कर तुम्हे गीतों में
धीरे-से फिसल जाती है |'

'मुझमें उसमे फर्क है इतना,
मैं हकीकत,वो एक सपना |
मेरी फिसलन दिखती है,
महसूस भी हो जाती है |'

'...पर वो निगोडी देकर एहसास,
सफर के साथ
फिसलकर हाथों से
न जाने कहाँ खो जाती है,
मत पूछ उसका नाम
जिंदगी कहलाती है !!'

रात का पहरा बन जाता है पिता...

जो दुखों कि बारिश में,
छतरी बन कर तनते हैं,
घर के दरवाजे पर 
नज़रबट्टू बन टंगते हैं,
समेत लेते हैं सबका 
अँधियारा भीतर,
खुदआंगन में दीपक बन जलते हैं ,
ऐसे होते हैं पिता  ||
बेशक पिता लोरी नही सुनाते,
माँ कि तरह आंसू नही बहाते 
पर दिनभर कि थकान
के बावजूद रात का पहरा बन जाते हैं ||
जब निकलते हैं सुबह तिनकों कि खोज में
किसी के खिलोने ,किसी कि किताबें,
किसी कि मिठाई,किसी कि दवाई,
परवाज पर होते है घर भर के सपने |
पिता कब होते हैं खुद के अपने||
जब सांझ ढले लौटते हैं घर,
माँ कि चुदियाँ खनकती हैं,
नन्ही गुडिया चहकती है,
सबके सपने साकार होते हैं,
पिता उस वक्त अवतार होते हैं |
जवान बेटियां बदनाम होने से डरती है
हर गलती पर आँखों कि मार पडती है ,
दरअसल भय,हया,संस्कार का बोलबाला है पिता.
मोहले  भर कि जुबान का ताला है पिता ||

शहर में घर का सपना...

माथे के पसीने का
एडी तक पहुंच जाने पर भी 
पचास गज का एक अदद फ्लैट
सपना ही बना रहा |

शहर में गजों में नापी जाती है तुम्हारी औकात
गाँव का कत्त्ठा,बीघा,और एकड के मुकाबले 
पचास,सौ या दो सौ गज कि हैसियत
बहुत बड़ी है शहर में |

गावं में सिर्फ कब्र नापी जाती है गज में
और वह दो गज जमीन भी 
तुम्हारी वास्तविक हैसियत बताने के लिए
बड़ी पड़ जाती है |



वो अहसास मात्रत्व का...

गर्व होता है खुद पर,
दुनिया के लिए किस्से सही,
हमें होता है फख्र खुद पर,यह समझ सकती है 'सिर्फ एक माँ'

गुजरना वो नों महीनों का,
न जाने कितनी उलझनों को सहना,
वो पीड़ा , वो आनंद ,
यह समझ सकती है'सिर्फ एक माँ'

वो लम्हा थम जाता है जनम का,
हजारों खुशियाँ आ जाती हैं कदमों में,
कोई दर्द कोई आंसू याद नहीं रहता,
जब मिलता है'स्पर्श'शिशु का,
यह समझ सकती है 'सिर्फ एक माँ'

माँ जैसा रब नहीं...

ईश्वर हर जगह हो नहीं सकता था,इसलिए माँ भिजवाई,
न मैं गुनी  हूँ न मैं ज्ञानी,और न इतना जग जाना |
पर इस नन्हे फूल  ने खिलकर गोद में मेरी,भेद मुझे ये समझाया,
की लाख जतन चाहे कर ले वो इश्वर हो ही नही सकता माँ जैसा |

एक ठिठुरती सर्द रात में.क्या देखा है किसी ने,
उस ईश्वर को गीले बिस्तर पर सोते |
ये केवल माँ हो सकती है...

वो तो पूरी कायनात का जादू लेकर बैठा है,
कोई करिश्मा कर भी  दे,तो बात बड़ी इसमें क्या है |
पर मैंने महसूस किया है,माँ के छु लेने भर ही से,
कैसा जादू होता है,गहरे से गहरा  दुःख हो चाहे छू मंत्र हो जाता है |

हम बन्दों को पता है क्या की ईश्वर दुःख भी देता है?
कर्मों का करके हिसाब वो फिर पीछे ही कुछ देता है |
कहाँ वो इतने दरियादिल की,झूठ-मूठ के आंसू से पिघलकर,
जान-बूझकर सारा छल,फिर भी ठगाए बच्चों से |
यह केवल माँ हो सकती है बस  केवल माँ हो सकती है ...

कहकर माँ को रब जैसा ,क्यूँ उसके भोलेपन पर प्रश्न करूं?
क्या देखा है कहीं किसी ने उसमे माँ-सा भोलापन?
ये तो बस माँ हो सकती है,बस केवल माँ हो सकती है...
माँ की व्याख्या केवल माँ है,माँ का वर्णन केवल माँ |
केवल माँ ही माँ जैसी है|रब नहीं है उस जैसा | 

दोस्ती को कभी अलविदा मत कहना...

झूठा अपनापन तो हर कोई जताता है
वो अपना ही क्या जो हर पल सताता है
यकीन न करना हर किसी पर क्यूंकि 
 करीब है कितना कोई ये वक्त बताता है|

खुशबू की तरह मेरे साथ रहना 
लहू बनकर मेरी नस में बहना 
दोस्ती है रिश्तों का अनमोल रत्न 
दोस्ती को कभी अलविदा मत कहना|

खुशबू की इक किताब कह बेठे 
उनको ताज़ा गुलाब कह बैठे 
उनको चुकर है झरना दीवाना
पानी को हम शराब कह बैठे |

मौन विदाई...

बसंत को विदा दी,
तो मौसम का दर्द,
पतझड़ के पीले पत्तों पर,
कुछ यूँ छलक आया,
मानो उसकी विदाई ,
वह सह नही पाया|
मुरझाये चेहरे से,
सन्नाटे बुनता है,
हवा को गुनता है,
पीले से सरसर पत्ते,
जब दूर उड़ जाते हैं,
ठूंठ सा होकर,
इंतज़ार करता है,
नन्ही कोपल से,
पत्तों के स्पर्श की,
बहांर तो सच एक,
हवा का झोंका है,
क्रमबद्ध आती-जाती है|
मन दुखता है,
फिर हरा  हो,
लुभाता है हर्षाता है,
मन मोह ले जाता है|

भीतर अब भी रहता है कोई...

गाँव की गलियों में,
तुम आज भी घूम सकते हो|
सभ्यता,संस्कृति,जिन्दा है अभी|

तुम किसी भी दीवार पर,
पीठ टीका,सुस्ता सकते हो|
अपनेपन की थाप ही महसूस होगी|

बांहे पसारे,स्वागत करेगा,
खंडहर ही हो,वह चाहे कोई|

किसी घर की देहरी पर,
पाँव रखकर सहमना  नहीं|
भीतर अब भी,रहता है कोई|

रसोई की खिडकी से,
गंध महसूस कर  सकते हो,
अब भी माँ  और काकी,
सांझे चूल्हे पर थेपटी हैं  रोटी|

हर आँगन की टूटी फूटी सीडियां,
अब भी तुमको अंदर ले जाती है,
क्यूंकि आँगन की वे अधूरी पायदाने,
सभ्यता और अपनत्व से पूरी है  अभी|

प्यार का पहला ख़त...


प्यार का पहला ख़त लिखने में वक्त तो लगता है
नये परिंदों को उड़ने में वक्त तो लगता है|

जिस्म की बात नहीं थी उन के दिल तक जाना था
लम्बी दूरी तय करने में वक्त तो लगता है|

गाँठ अगर लग जाये तो फिर रिश्ते हो या डोरी
लाख करे कोशिश खुलने में वक्त तो लगता है|

हमने इलाजे जख्में दिल तो ढूंढ लिया लेकिन
गहरे जख्मों को भरने में वक्त तो लगता है|

जिंदगी तुने...


जिंदगी तुने लहू लेके,दिया कुछ भी नहीं
तेरे दामन में मेरे वास्ते क्या कुछ भी नही

मेरे इन हाथों की चाहो तो तलाशी लेलो
मेरे हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नही

हमने देखा है कई ऐसे खुदाओं को यहाँ
सामने जिनके वो सचमुच का खुदा कुछ भी नहीं

या खुदा अबके ये किस रंग में आई है बहार
जर्द ही जर्द है पेड़ों पे हरा कुछ भी नहीं

दिल भी इक जिद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह
या तो सब कुछ ही इसे चाहिए,या कुछ भी नहीं|

क्या गजब...


क्या गजब की फूल भी खिलते हैं खारों के बीच,
जी रहें हैं हम भी दोस्तों यारों के बीच|

एक दिन भूले से मैंने 'दिन'को दिन क्या कह दिया,
अपनों ने ही रख दिया गुनाहगारों के बीच|

क्या बताएं अब तुम्हें अपने नये घर का पता,
रह रहें हैं हम दहशत भरी दीवारों के बीच|

दोस्तों के दरमियाँ याद आये वो 'दुश्मन',
जहाँ महफूज़ थे हम उनकी तलवारों के बीच|

पहले टुकड़ों-टुकड़ों में बँटी यह जमीन,
और अब आसमान,
लगता है'खुदा भी बंट गया है,
इस मजहबी हकदारों के बीच|
क्या गजब की फूल भी.....................................


पिता...



पिता का केवल चेहरा था हंसमुख
लेकिन पिता को खुद हँसते हुए
देखा नहीं किसी ने कभी

नींव की ईंट की तरह
भार साधे पूरे घर का अपने ऊपर
अडिंग खड़े रहे पिता

आये अपार भूकंप
चक्रवात अनगिन
गगन से गाज की तरह गिरती रही
विपदाओं में झुका नहीं पिता का ललाट

कभी बहन की फीस कम पड़ी
तो पिता ने शेव करवाना बंद रखा पूरे दो माह
कई बार तो मेरी मटरगश्तियों के लिए भी
पर पिता ने रख दिए मेरी जेब में कुछ रूपए
जो बाद में पता लगा
की लिए थे उन्होंने किसी से उधार

पिता कम बोलते थे या कहें
की लगभग नहीं बोलते थे
आज सोचता हूँ
उनके भीतर
इतना मचा रहता था घमासान
जिसे झुझते हुए
खर्च हो रही थी
उनके दिल की हर धड़कन

माँ को देखा हे हमने कई बार
पिता की छाती पर सिर धरे उसे अनकते हुए

माँ की उदास साँसों में
पिता की अतृप्त इच्छाओं का ज्वार
सिर पटकता कराहता था बेआवाज़


यह एक सहमत रहस्य था दोनों का

जिसे जाना मैंने पिता बनने के बाद



रोको,रोको ये डोली मेरी...


रोको, रोको !
ये डोली मेरी
कहाँ चली ?
छूटा गाँव छूटी गली|

रोक ले बाबुल,
दौड़ के आजा,
बहरे हुए कहार,
अंधे भी हैं ये,
इन्हें दीखें,
तेरे मेरे
आंसुओं की धार|
रोको,रोको|
ये डोली मेरी
कहाँ चली?
छूटा गाँव छूटी गली|

कपडे सिलाये
गहने गदाए,
दिए तुने
मखमल थान,
बेच के धरती ,
खोल के गैया,
बांधा तुने सब सामान,
दान दहेज
सहेज के सारा,
राह भी दी अनजान,
मील के पत्थर
कैसे बांचुं,
दिया अक्षर-ज्ञान|
गिरी है
मुझ पर बिजली|
छूटा गाँव छूटी गली |

रोको,रोको|
ये डोली मेरी
कहाँ चली?
छूटा गाँव छूटी गली|

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा...


एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा

जैसे जन्नत की हूर,जैसे आँखों का नूर
जैसे नन्हा फरिश्ता,जैसे बेनाम रिश्ता
जैसे कोई गजल ,जैसे खिलता कँवल
जैसे ताज महल हो चांदनी में खड़ा
एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा

जैसे कोयल की आवाज़,जैसे सरगम का साज
जैसे ममता का हाथ,जैसे बरसों का साथ
जैसे मुश्किल में दुआ,जैसे दर्द में दवा
जैसे सामने खड़ा हो मेरा खुदा
एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा

जैसे आँखों का खुमार,जैसे चमन की बहार
जैसे अर्दु जुबान,जैसे तितली की जान
जैसे शहद सी बात,जैसे मिलन की रात
जैसे परदेस में मिल जाये कोई सगा
एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा

जैसे कश्मीरी अनार,जैसे वादियों की बहार
जैसे बारिश का मौसम,जैसे ख़ुशी में आँखे नम
जैसे मखमली लिबास,जैसे मिलन की आस
जैसे बिछड़ कर मिलने का कोई समां
एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा

जैसे फूलों की महक,जैसे चिड़ियों की चहक
जैसे आँखों का जादू,जैसे दिल हो बेकाबू
जैसे होंठों का कमाल,जैसे दीवाने हुस्न बेमिसाल
जैसे मंदिर की मूर्त में हो मेरा खुदा
एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा

जैसे शबनमी एहसास,जैसे बरसों की प्यास
जैसे आसमा में धनक,जैसे बिजली की चमक
जैसे फलदार शजर,जैसे प्यार भरी नज़र
जैसे कोई मोहब्बत का देवता
एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा

जैसे वीराने में सदा,जैसे वो सबसे जुदा
जैसे डूबते को सहारा,जैसे वो सबसे प्यारा
जैसे गेसुओं की छाँव,जैसे घुंघरुओं के पाँव
जैसे भुला कोई अपने घर का पता
एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा

जैसे संगमरमर का बदन,जैसे जवानी की अगन
जैसे भीगे-भीगे बाल,जैसे हुस्न पे पहरा
जैसे महबूब से हो किसी को वफा
एक लडकी को देखा तो ऐसा लगा

जैसे होंठों की लाली,जैसे फूलों की डाली
जैसे खिलती शाम,जैसे अल्लाह का नाम
जैसे कोई कसम,जैसे सच्चा सनम
जैसे अपने वतन से किसी को वफा
एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा...








संयम...


संयम का साथ छोड़ो,संयम से नाता जोड़ो,
बांधे ऐसी कोई डोर,बाहर से भीतर बंध जाये|

लहरें तो आखिर लहरें,पानी भी आखिर पानी,
तूफानों ने कब जानी,पानी की सजल कहानी

सागर का लेकिन संयम,जीवन से कभी नहीं कम,
बांधे तो ऐसी कोई डोर,जीवन से सागर बांध जाये|

मोती-माणिक या कंचन या गीली-सुखी माटी,
सब बोझ बने रह जाते जीवन चदता जब घाटी

साँसों का लेकिन संयम,जीवन से कभी नही कम,
बांधे तो ऐसी कोई डोर,साँसों से गिरधर बंध जाये|

कर्मों का लेखा जोखा करने वाला ईशवर है,
दुनिया,यह सारी दुनिया उसका अपना घर है

शब्दों का लेकिन संयम,वाणी से कभी नहीं कम,
बांधे तो ऐसी कोई डोर,अक्षर से अक्षर बंध जाये|

मैं और मेरी तन्हाई...


आवारा है गलियों में मैं और मेरी तन्हाई
जाये तो कहाँ जाएँ हर मोड़ पे है रुसवाई
मैं और मेरी तन्हाई

यह फूल से पहरे हैं हँसते हुए गुलदस्ते
कोई भी नहीं अपना बेगाने हैं सब रास्ते
मैं और मेरी तन्हाई

अरमान सुलगते हैं सीने में चिता जैसे
कातिल नजर आती है दुनिया की हाय!जैसे
रोती है मेरे दिल पर बजती हुई शहनाई
मैं और मेरी तन्हाई

हर रंग में यह दुनिया सौ रंग बदलती है
रो कर कभी हंसती है हंस कर कभी गाती है
यह प्यार की बाहें हैं या मौत की अंगड़ाई
मैं और मेरी तन्हाई

आकाश के माथे पर तारों का चारगवां है
पहलू में मेरे मगर मेरे जख्मों का गुल्स्तान है
आँखों से लहू टपकता है दामन में बहार आई
मैं और मेरी तन्हाई||